उत्तर प्रदेशउत्तराखण्डनवीनतमसामाजिक

बेटी की ‘घर वापसी’ पर ढोल-नगाड़े और जश्न: रिटायर्ड जज ने तलाक को दुख नहीं, उत्सव बनाकर पेश की मिसाल

ख़बर शेयर करें -

समाज में जहां आज भी बेटी के तलाक को एक सामाजिक कलंक या गहरे दुख के तौर पर देखा जाता है, वहीं उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने पुरानी सोच की बेड़ियां तोड़ दी हैं। उत्तराखंड कैडर के सेवानिवृत्त जिला जज डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा ने अपनी बेटी के तलाक के बाद उसका स्वागत किसी शोक की तरह नहीं, बल्कि एक भव्य उत्सव की तरह किया।

फूल-मालाएं और ‘I Love My Daughter’ की टी-शर्ट

Ad Ad

शास्त्रीनगर निवासी डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा की बेटी प्रणिता वशिष्ठ का 4 अप्रैल 2026 को फैमिली कोर्ट से आधिकारिक तौर पर तलाक मंजूर हो गया। आम तौर पर ऐसे मौकों पर परिवार सन्नाटे में डूब जाते हैं, लेकिन डॉ. शर्मा ने अपनी बेटी के सम्मान में खुशियां मनाईं। जब प्रणिता घर पहुंचीं, तो उनका स्वागत ढोल-नगाड़ों, नाच-गाने और फूलों की बारिश के साथ किया गया। परिवार के सदस्यों ने विशेष रूप से ‘I Love My Daughter’ लिखी हुई टी-शर्ट पहनकर अपनी बेटी के प्रति अटूट समर्थन और प्यार जाहिर किया।

“बेटी बोझ नहीं, हमारा गौरव है”

इस अनूठी पहल के पीछे डॉ. शर्मा का संदेश साफ है—बेटी की खुशी और उसका आत्मसम्मान किसी भी सामाजिक दबाव से ऊपर है। उन्होंने समाज को यह दिखाने की कोशिश की है कि यदि कोई रिश्ता बोझ बन जाए या गलत मोड़ पर हो, तो उससे बाहर निकलना हार नहीं बल्कि एक नई और सम्मानजनक शुरुआत है।

डॉ. शर्मा का कहना था कि उन्होंने कोई धन-दौलत या एलिमनी नहीं मांगी, बल्कि सिर्फ अपनी बेटी को सम्मान के साथ वापस घर लाए हैं। उनके शब्दों में, ‘बेटी कोई सामान नहीं है जिसे कहीं भी छोड़ दिया जाए, उसका सम्मान सबसे पहले है।’ प्रणिता की शादी साल 2018 में एक आर्मी मेजर से हुई थी, लेकिन शादी के बाद उन्हें मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। ऐसे में उन्होंने अपने आत्मसम्मान को प्राथमिकता देते हुए कानूनी रास्ता अपनाया और आखिरकार न्याय पाया। उनकी इस यात्रा ने यह संदेश दिया कि गलत रिश्तों में बने रहना मजबूरी नहीं, बल्कि उससे बाहर निकलना ही असली साहस है।

प्रणिता वशिष्ठ न केवल शिक्षित हैं, बल्कि पेशेवर रूप से भी मजबूत हैं। वह मनोविज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट हैं और वर्तमान में तेजगढ़ी चौराहे स्थित प्रणव वशिष्ठ ज्यूडिशियल अकादमी में फाइनेंस डायरेक्टर के रूप में कार्यरत हैं। वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं। साल 2022 में उनके भाई, जो सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता थे, एक दुर्घटना में गंभीर चोट लगने के कारण चल बसे। उनकी याद में ही इस अकादमी की स्थापना की गई, जो आज जरूरतमंदों के लिए शिक्षा और न्याय से जुड़ा एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी है।

डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार शर्मा के इस कदम की विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा सराहना की जा रही है। यह घटना पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गई है। उनकी यह पहल उन अभिभावकों के लिए एक प्रेरणा है, जो समाज के डर और लोक-लाज के कारण अपनी बेटियों को गलत रिश्तों में रहने के लिए मजबूर कर देते हैं। यह कहानी साफ तौर पर दिखाती है कि नारी सशक्तिकरण केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे साहसी और ठोस फैसलों से ही समाज में असली बदलाव आता है।

Ad Ad