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उत्तराखंड में 100 साल की बुजुर्ग को कंधा देने को नहीं मिले लोग, SSB के जवानों ने किया अंतिम संस्कार, जानें कारण

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100 साल की झूपा देवी का बुधवार को निधन हुआ था, गांव में सिर्फ बच्चे और बुजुर्ग होने से अंतिम संस्कार कठिन हो गया था

पिथौरागढ़। उत्तराखंड में पलायन का दर्द अक्सर देखने को मिलता है। पलायन की पीड़ा दर्शाने वाला ऐसा ही नजारा यहां तब देखने को मिला जब सौ साल की बुजुर्ग महिला का देहांत हुआ। पलायन की वजह से खाली हो चुके गांव में बुजुर्ग महिला को कंधा देने के लिए गांव में एक भी युवा मौजूद नहीं था। गांव में बुजुर्ग महिला व पुरुष ही थे। ऐसे में एसएसबी के जवान सामने आए।

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उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र लगातार पलायन के कारण खाली हो रहे हैं। सरकार के द्वारा भले ही पलायन आयोग बनाकर करोड़ों की योजना शुरू की गई है, लेकिन इसके इतर गांवों में हालात कुछ और ही हैं। अब तो गांव में किसी के बीमार को अस्पताल पहुंचाने या फिर मौत पर कंधा देने के लिए भी नहीं मिल रहे हैं। पिथौरागढ़ जिले में एक गांव में एक बुजुर्ग महिला की मौत के बाद कंधा देने और अंत्येष्टि करने के लिए ग्रामीण नहीं होने पर एसएसबी से मदद लेकर अंत्येष्टि की गई। सीमांत पिथौरागढ़ जिले के नेपाल सीमा से सटे तड़ीगांव में एक बुजुर्ग महिला को श्मशान घाट पहुंचाने के लिए पर्याप्त लोग नहीं मिले। ऐसे में सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के जवानों ने यह फर्ज निभाया। जवानों ने न सिर्फ अर्थी को कंधा दिया बल्कि अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां भी लाये और अंत्येष्टि भी कराई।

नेपाल सीमा के पास स्थित तड़ीगांव की रहने वाली करीब 100 वर्षीय बुजुर्ग महिला झूपा देवी का बुधवार 31 दिसंबर 2025 को निधन हो गया था। शव को अंत्येष्टि के लिए गांव से करीब ढाई किमी दूर काली नदी के तट तक ले जाना था, लेकिन गांव में अंतिम यात्रा के लिए सक्षम ग्रामीण नहीं थे। गांव के पूर्व प्रधान भूपेंद्र चंद ने बताया है कि शव यात्रा के लिए गांव में चार-पांच लोग थे, वे भी वृद्ध थे। ऐसे में नेपाल सीमा पर तैनात एसएसबी के जवानों से मदद मांगी गई। इस पर एसएसबी के चार जवान और दो अधिकारी मदद के लिए पहुंचे। जवानों की सहायता से शव को काली नदी के तट पर लाया गया। यहां 65 वर्षीय रमेश चंद ने मां की चिता को मुखाग्नि दी।

तड़ीगांव में पलायन का प्रमुख कारण सड़क निर्माण में देरी और वन्य जीवों की दहशत है। 2019 में पंचायत की बनवाई कच्ची सड़क अब तक पक्की नहीं हुई है। जंगली सुअर खेती को नष्ट कर रहे हैं। साथ ही गुलदार और भालू की दहशत भी बनी रहती है। गांव में 20 साल पहले 37 परिवार थे। अभी सिर्फ 13 परिवार हैं। इनमें भी बुजुर्ग और बच्चे ही हैं। यदि समय रहते सरकार के द्वारा गांवों के पलायन रोकने के लिए ठोस उपाय नहीं किये गए, तो इसी तरह की घटना अन्य गांवों में भविष्य में देखी जा सकती है।