बागेश्वर : नवरात्र में प्राचीन मां भगवती मंदिर में लगी आग, मुख्य मंदिर को भारी नुकसान, वीडियो देखें…
बदियाकोट में लकड़ी से बने मंदिर में आग से मची अफरा-तफरी, सदियों पुरानी धार्मिक विरासत पर संकट; शॉर्ट सर्किट या दीपक से आग लगने की आशंका, कारण स्पष्ट नहीं
बागेश्वर/कपकोट। नवरात्र के दौरान बागेश्वर जिले की कपकोट तहसील के दूरस्थ बदियाकोट गांव में स्थित प्राचीन मां भगवती मंदिर में आग लगने से हड़कंप मच गया। शुक्रवार सुबह लकड़ी से बने मंदिर में आग तेजी से फैल गई। घटना में मुख्य मंदिर को भारी नुकसान पहुंचने की सूचना है। आग की घटना से क्षेत्र के श्रद्धालुओं में चिंता व्याप्त है। मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि दानपुर क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है। फिलहाल आग लगने का वास्तविक कारण स्पष्ट नहीं हो पाया है।

स्थानीय निवासी आन सिंह के अनुसार, मंदिर का ढांचा मुख्य रूप से लकड़ी से बना होने के कारण आग से नुकसान अधिक होने की आशंका है। मंदिर में बिजली की व्यवस्था थी और पूजा-अर्चना के दौरान दीपक भी जलाए जाते थे। ऐसे में शॉर्ट सर्किट अथवा दीपक से आग लगने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, आग लगने के कारणों को लेकर अभी किसी आधिकारिक निष्कर्ष की जानकारी सामने नहीं आई है।
लकड़ी की नक्काशी और पारंपरिक वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है मंदिर
बदियाकोट स्थित आदिबद्री भगवती माता का मंदिर अपनी पारंपरिक हिमालयी वास्तुकला और लकड़ी पर की गई आकर्षक नक्काशी के लिए जाना जाता है। मंदिर की विशिष्ट बनावट इसे क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में अलग पहचान देती है। नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में पर्व के बीच मंदिर में आग लगने की घटना ने लोगों को व्यथित कर दिया है। मंदिर को हुए नुकसान की पूरी स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही इसकी ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत पर पड़े प्रभाव का आकलन किया जा सकेगा। घटना ने पहाड़ी क्षेत्रों में लकड़ी से निर्मित प्राचीन मंदिरों की सुरक्षा और संरक्षण की चुनौती को भी सामने ला दिया है।

मां भगवती के साथ लाटू और हूण देवता की भी होती है पूजा
बदियाकोट का मां भगवती मंदिर दानपुर क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। यहां मां भगवती नंदा के साथ उनके धर्मभाई माने जाने वाले लाटू देवता और तिब्बती हूण देवता की भी पूजा-अर्चना की जाती है। यह धार्मिक परंपरा मंदिर को विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मां आदिशक्ति ने इसी स्थान पर निशुंभ नामक दैत्य का वध किया था। इसी कथा के आधार पर क्षेत्र को वधकोट कहा जाने लगा। स्थानीय बुजुर्ग आज भी बदियाकोट को बदकोट नाम से संबोधित करते हैं। मंदिर से जुड़ी ये मान्यताएं पीढ़ियों से क्षेत्रीय लोकविश्वास और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा रही हैं।
आठ वर्ष में होती है बड़ी जात, बारह वर्ष में नन्दा जातरा
मंदिर की धार्मिक परंपराएं भी बेहद विशिष्ट हैं। यहां हर आठ वर्ष में आठ्यौं यानी बड़ी जात का आयोजन किया जाता है। हर चार वर्ष में घर-आठ्यौं के नाम से छोटी जात आयोजित होती है, जबकि प्रत्येक बारह वर्ष में नन्दा जात अथवा माल जातरा का आयोजन होता है।
स्थानीय परंपरा के अनुसार, आठ्यौं के दौरान देव-डांगर तीन महीने तक व्रत रखते हैं। इसके बाद वे सुंदरढूंगा क्षेत्र स्थित नंदा कुंड पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और नंदाष्टमी के अवसर पर वापस लौटते हैं। इस धार्मिक आयोजन में विभिन्न क्षेत्रों के श्रद्धालुओं की भागीदारी रहती है। गढ़वाल से आने वाले पूजार्थियों के लिए भी पूजा का समय निर्धारित रहता है।
इस परंपरा के तहत दानपुर क्षेत्र की चार पट्टियों के अलावा जोहार और मुनस्यारी क्षेत्र के लोगों को भी आमंत्रित किया जाता है। श्रद्धालु माता को चढ़ावा अर्पित करते हैं और जात में शामिल होकर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। मंदिर से जुड़ी ये परंपराएं स्थानीय समाज की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
लोककथा में मृग रूप धारण कर मां नंदा के पहुंचने का उल्लेख
बदियाकोट मंदिर से जुड़ी एक प्राचीन लोककथा के अनुसार, मां नंदा मृग का रूप धारण कर गढ़वाल के बंड नामक स्थान से यहां पहुंची थीं। उनके पीछे छलि और बली नाम के दो पुरुष शिकार करने आए। लोकमान्यता है कि माता ने कन्या का रूप धारण कर दोनों को दर्शन दिए और बदियाकोट की ऊंची पहाड़ी पर निवास करने का आशीर्वाद दिया। उन्होंने दोनों से मंदिर बनाकर पूजा-अर्चना करने को कहा और फिर अंतर्धान हो गईं।
लोकविश्वास के अनुसार, छलि और बली के छह-छह पुत्र हुए, जो आगे चलकर बारह बदकोटी के नाम से प्रसिद्ध हुए। इनमें जमनी दानू, कपूर दानू, कुबाल दानू, बालचंद दानू, जयंग दानू, माल दानू, भग दानू, विरंग दानू, जीव दानू, बैनर दानू, वीर दानू और मली दानू के नाम शामिल हैं।
स्थानीय मान्यता है कि मां भगवती ने इन परिवारों को देवशक्ति प्रदान की थी। इसी वजह से मंदिर और माता की पूजा से जुड़े अनुष्ठानों में बारह बदकोटी दानू परिवारों की विशेष भूमिका मानी जाती है। यह लोककथा मंदिर के धार्मिक महत्व और स्थानीय समाज की परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है।
आग की घटना से धार्मिक विरासत के संरक्षण पर उठे सवाल
नवरात्र जैसे महत्वपूर्ण पर्व के दौरान प्राचीन मंदिर में आग लगने की घटना से बदियाकोट और आसपास के क्षेत्रों के श्रद्धालु चिंतित हैं। मंदिर क्षेत्र की धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोककथाओं, पारंपरिक वास्तुकला और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं का भी केंद्र है।
फिलहाल आग लगने के कारणों और मंदिर को हुए नुकसान की पूरी स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। घटना के बाद प्राचीन लकड़ी के मंदिरों में विद्युत सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा के इंतजाम और ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों के संरक्षण की आवश्यकता एक बार फिर चर्चा में आ गई है।

