Sunday, July 19, 2026
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शारदा कॉरिडोर के नाम पर अवैध खनन का आरोप, आरटीआई कार्यकर्ता ने डीएम से कार्रवाई की मांग

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चम्पावत। टनकपुर के खेतखेड़ा क्षेत्र में शारदा कॉरिडोर परियोजना के नाम पर कथित अवैध खनन का मामला सामने आया है। आरटीआई कार्यकर्ता एवं उत्तराखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता डॉ. मदन सिंह महर ने जिलाधिकारी को पत्र भेजकर तत्काल खनन रोकने, निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने मामले की शिकायत सीएम पोर्टल में भी की है। पत्र की प्रतिलिपि राज्य के खनन विभाग, तहसील प्रशासन, वन विभाग और मुख्यमंत्री उत्तराखंड को भी प्रेषित की है।

डॉ. महर का आरोप है कि वर्तमान मानसून सीजन के दौरान भी नदी तल से भारी मशीनों के जरिए खनन किया जा रहा है, जो खनन नियमों और पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन है। उनका दावा है कि निकाली जा रही खनन सामग्री को पूर्णागिरि रोड पर लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित एक क्रशर प्लांट तक पहुंचाया जा रहा है। शिकायत में कहा गया है कि लगातार हो रहे कथित अवैध खनन से नदी का प्राकृतिक प्रवाह और स्वरूप बदल गया है, जिससे आसपास के गांवों में कटाव और बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। इससे स्थानीय लोगों की जान-माल और आजीविका पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।

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उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि संबंधित ठेकेदार आवश्यक अनुमति के बिना खनन सामग्री का उत्खनन और परिवहन कर रहा है, जबकि प्रभावित क्षेत्र में बाढ़ सुरक्षा या नदी तट संरक्षण के लिए कोई प्रभावी कार्य नहीं किया जा रहा है। डॉ. महर ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि शारदा नदी के अपस्ट्रीम क्षेत्र में पिछले लगभग 18 वर्षों से खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है। वहीं डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में भी मौसमी नियमों के तहत 30 मई को सभी खनन गेट बंद कर दिए गए थे। इसके बावजूद अपस्ट्रीम क्षेत्र में मानसून के दौरान कथित रूप से खनन जारी रहना प्रशासनिक लापरवाही और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन की ओर संकेत करता है।

प्रशासन से की ये प्रमुख मांगें

  • खेतखेड़ा क्षेत्र में चल रहे कथित अवैध खनन पर तत्काल रोक लगाई जाए।
  • पूरे मामले की निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच कराई जाए।
  • खनन एवं पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
  • प्रभावित गांवों की सुरक्षा के लिए बाढ़ नियंत्रण और नदी संरक्षण के कार्य तत्काल शुरू किए जाएं।

डॉ. मदन सिंह महर ने पत्र में चेतावनी दी है कि यदि समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की गई तो वे पर्यावरण संरक्षण और जनहित में न्यायालय की शरण लेने के लिए बाध्य होंगे।