पुलिस कांस्टेबल की हत्या करने वाले आरोपी राजेंद्र कुमार आर्या की सजा में बदलाव, जानें क्या है पूरा मामला
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश के दौरान एक पुलिस कांस्टेबल की हत्या करने वाले आरोपी राजेंद्र कुमार आर्या की सजा में बड़ा बदलाव किया है। न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी की सजा को धारा 302 (हत्या) से बदलकर धारा 304 भाग 1 (गैर इरादतन हत्या) के तहत कर दिया है। अदालत ने माना कि यह घटना पूर्व नियोजित नहीं थी, बल्कि अचानक हुई हाथापाई का परिणाम था।
दरअसल घटना 28 मई 2014 की है, जब हल्द्वानी के मुखानी पुलिस चौकी पर चोरी के आरोप में हिरासत में लिए गए राजेंद्र कुमार आर्या ने भागने का प्रयास किया था। जब ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल सुरेंद्र सिंह ने उसे पकड़ने की कोशिश की तो आरोपी ने जमीन पर पड़े लोहे के सरिए से उनके सीने पर वार कर दिया। गंभीर रूप से घायल कांस्टेबल को अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। निचली अदालत ने इस अपराध के लिए राजेंद्र को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि यह मामला ‘हत्या’ का नहीं है, क्योंकि आरोपी का उद्देश्य सिपाही को मारना नहीं, बल्कि केवल वहां से भागना था।
अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि आरोपी ने पुलिस हिरासत में रहते हुए एक गंभीर अपराध को अंजाम दिया। हालांकि, अदालत ने पाया कि घटना के समय आरोपी के पास कोई पहले से मौजूद हथियार नहीं था और उसने मौके पर पड़े सरिए का उपयोग किया, जो दर्शाता है कि यह कृत्य बिना किसी पूर्व योजना के आवेश में किया गया था।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ‘हथकड़ी’ की कहानी पर संदेह व्यक्त किया। अभियोजन का दावा था कि आरोपी ने हथकड़ी खोलकर भागने की कोशिश की, लेकिन अदालत ने पाया कि जनरल डायरी प्रविष्टियों में आरोपी को हथकड़ी लगाने का कोई जिक्र नहीं था। अदालत ने टिप्पणी की कि संभवत अभियोजन ने अपने मामले को मजबूत करने के लिए हथकड़ी की कहानी जोड़ी थी, जबकि वास्तव में आरोपी को हथकड़ी नहीं लगी थी।
कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 300 के अपवाद 4 का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि मृत्यु बिना किसी पूर्व चिंतन के अचानक हुई लड़ाई के दौरान हुई हो, तो उसे हत्या के बजाय गैर-इरादतन हत्या माना जाता है। चूंकि राजेंद्र कुमार आर्य पिछले 11 साल से भी ज्यादा समय से (28 मई 2014 से) जेल में बंद है, इसलिए अदालत ने उसकी अब तक की काटी गई सजा को ही पर्याप्त मानते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है।
इस निर्णय के साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि हालांकि, सिपाही की मौत अत्यंत दुखद थी, लेकिन कानूनी मापदंडों के अनुसार इसे ‘सुनियोजित हत्या’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने आरोपी पर लगाए गए जुर्माने को यथावत रखा है, लेकिन जेल से उसकी रिहाई का रास्ता साफ कर दिया है।

