शराब की गंध से नहीं साबित होगा नशे में ड्राइविंग, वैज्ञानिक जांच जरूरी: उत्तराखंड हाईकोर्ट
देहरादून। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटनाओं और नशे में वाहन चलाने से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी चालक के मुंह से शराब की गंध आने मात्र से उसे नशे की हालत में वाहन चलाने वाला नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि इसके लिए वैज्ञानिक परीक्षण से यह साबित होना आवश्यक है कि चालक के शरीर में शराब की मात्रा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में निर्धारित सीमा से अधिक थी।
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि रक्त परीक्षण (Blood Test) या ब्रेथ एनालाइजर (Breath Analyzer) जैसी वैज्ञानिक जांच के बिना केवल शराब की गंध के आधार पर गंभीर आपराधिक आरोप तय नहीं किए जा सकते।
क्या था मामला?
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता अमर सिंह बदरीनाथ धाम से चमोली की ओर जीप चला रहा था। रास्ते में वाहन अनियंत्रित होकर पलट गया, जिससे कई यात्री घायल हो गए और एक यात्री की मौत हो गई। दुर्घटना के बाद चालक का चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया। डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में चालक के मुंह से शराब की गंध आने का उल्लेख किया, लेकिन न तो उसका रक्त परीक्षण कराया गया और न ही ब्रेथ एनालाइजर से जांच की गई।
कोर्ट ने क्या कहा?
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा-185 के तहत किसी व्यक्ति को तभी नशे में वाहन चलाने वाला माना जा सकता है, जब वैज्ञानिक जांच में यह साबित हो कि उसके रक्त के प्रति 100 मिलीलीटर में 30 मिलीग्राम से अधिक अल्कोहल मौजूद थी। अदालत ने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि मेडिकल रिपोर्ट में केवल शराब की गंध का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। यदि यह साबित करना है कि चालक निर्धारित सीमा से अधिक शराब के प्रभाव में था, तो वैज्ञानिक जांच अनिवार्य है।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के उस आदेश को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105, 125(क), 125(ख) और 281 के तहत आरोप तय किए गए थे। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के अभाव में धारा-105 के तहत लगाए गए आरोप को हटाने का आदेश दिया। हालांकि धारा 125(क), 125(ख) और 281 के तहत आरोप यथावत बने रहेंगे।
जांच एजेंसियों के लिए अहम संदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि गंभीर आपराधिक आरोप केवल अनुमान, परिस्थितिजन्य साक्ष्य या शराब की गंध के आधार पर तय नहीं किए जा सकते। ऐसे मामलों में वैज्ञानिक और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य प्रस्तुत करना अनिवार्य है। इस फैसले को भविष्य में नशे में वाहन चलाने से जुड़े मामलों की जांच और अभियोजन प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे जांच एजेंसियों को रक्त परीक्षण और ब्रेथ एनालाइजर जैसी वैज्ञानिक जांच कराने की जिम्मेदारी और अधिक गंभीरता से निभानी होगी।

