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रूढ़ियों की चिता पर बेटियों ने लिखी नई इबारत, पिता को दी मुखाग्नि; अंतिम विदाई देने घाट पहुंचीं पत्नी

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डॉ. नारायण सिंह जन्तवाल की अंतिम यात्रा बनी सामाजिक रूढ़िवादिता को चुनौती देने वाली मिसाल, बेटियों ने निभाया पिता का अंतिम संस्कार का फर्ज, पत्नी प्रो. सावित्री जन्तवाल ने भी नम आंखों से दी विदाई

हल्द्वानी। समाज में सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी परंपराओं के बीच आज रानीबाग के चित्रशिला घाट पर एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने न सिर्फ लोगों की आंखें नम कर दीं, बल्कि समाज की जड़ हो चुकी मान्यताओं पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। उत्तराखंड क्रांति दल के पूर्व अध्यक्ष और नैनीताल के पूर्व विधायक डॉ. नारायण सिंह जन्तवाल पंचतत्व में विलीन हो गए। उनकी दोनों बेटियों ने पिता को मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई, जबकि पत्नी प्रोफेसर सावित्री कैड़ा जन्तवाल भी पति को अंतिम विदाई देने चित्रशिला घाट पहुंचीं।

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यह दृश्य केवल एक परिवार के दुख और बिछोह का नहीं था, बल्कि उन सामाजिक रूढ़ियों के टूटने का भी था, जिनमें बेटियों को पिता का अंतिम संस्कार करने से रोका जाता रहा है और पत्नी के श्मशान घाट जाने को लेकर भी सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। कुमाऊं की परंपराओं में तो कई स्थानों पर पति-पत्नी के एक-दूसरे की अंतिम यात्रा में शामिल होने को लेकर भी सामाजिक बंदिशें रही हैं।

लेकिन डॉ. जन्तवाल की अंतिम विदाई ने इन मान्यताओं के सामने एक अलग उदाहरण प्रस्तुत किया। दोनों बेटियों ने न केवल पिता की अर्थी को अंतिम विदाई दी, बल्कि मुखाग्नि देकर बेटे-बेटी के बीच बनाए गए उस पारंपरिक भेद को भी चुनौती दी, जो आज के आधुनिक समाज में भी कहीं न कहीं मौजूद है। पत्नी का घाट तक पहुंचना भी उन सामाजिक धारणाओं के विपरीत एक सशक्त संदेश था, जिनमें महिलाओं के लिए शोक और अंतिम संस्कार से जुड़ी भूमिकाएं तय कर दी गई हैं।

इस भावुक क्षण के पीछे एक पिता की इच्छा भी थी। डॉ. जन्तवाल की दोनों बेटियों ने बताया कि पिता स्वयं चाहते थे कि उनकी अंतिम विदाई बेटियां ही करें। बेटियों के मुताबिक, जब वे कभी मजाक में पिता से उनकी अंतिम यात्रा को लेकर बात करती थीं तो वह कहते थे कि तुम्हें ही मेरा सब कुछ करना है और तुम ही मुझे मुखाग्नि देना। पिता की इसी इच्छा को दोनों बेटियों ने पूरा किया।

पति को अंतिम विदाई देने पहुंचीं प्रो. सावित्री जन्तवाल ने भी इस कठिन घड़ी में अद्भुत धैर्य का परिचय दिया। वे घाट पर मौजूद शोकाकुल लोगों से बातचीत करती रहीं और डॉ. जन्तवाल के अंतिम समय से जुड़ी बातें साझा करती रहीं। उल्लेखनीय है कि प्रो. सावित्री जन्तवाल कुमाऊं विश्वविद्यालय के नैनीताल परिसर में इतिहास विभाग की प्रोफेसर हैं।

डॉ. जन्तवाल की अंतिम विदाई ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर किया है कि आखिर संस्कारों और परंपराओं के नाम पर महिलाओं के अधिकारों और भावनाओं पर बंदिशें क्यों लगाई जाती हैं? पिता को मुखाग्नि देने का अधिकार केवल बेटे का और पति की अंतिम यात्रा में शामिल होने का अधिकार केवल पुरुषों का क्यों माना जाए?

आखिरकार अंतिम संस्कार का संबंध रिश्ते, प्रेम और जिम्मेदारी से है, न कि किसी के बेटा या बेटी होने से। जब बेटियां अपने पिता की जिम्मेदारी निभा सकती हैं, तो फिर समाज की बनाई गई बंदिशें उनके रास्ते में क्यों आएं? चित्रशिला घाट पर आज उठी चिता की लपटों के साथ एक संदेश भी समाज तक पहुंचा—परंपराएं इंसान के लिए होती हैं, इंसान परंपराओं के लिए नहीं। बदलाव की शुरुआत ऐसे ही साहसिक कदमों से होती है।

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