गर्भस्थ शिशु को बचाने के लिए तीन अस्पतालों के चक्कर, फिर भी नहीं बची नन्हीं जान; डीएम ने दिए जांच के निर्देश
चम्पावत: गर्भ में पल रहे शिशु की जान बचाने की उम्मीद में एक परिवार ने लोहाघाट से चम्पावत और फिर खटीमा तक अस्पतालों के चक्कर लगाए, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद गर्भस्थ शिशु को नहीं बचाया जा सका। मामला लोहाघाट विकासखंड के गुदमेश क्षेत्र के मटियाना गांव का है। घटना सामने आने के बाद जिलाधिकारी मनीष कुमार ने प्रकरण का तत्काल संज्ञान लेते हुए निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जांच के निर्देश दिए हैं।
मटियाना निवासी जीवन सिंह सामंत की 22 वर्षीय पत्नी प्रियंका गर्भवती थीं। जीवन सिंह हरियाणा के सोनीपत में एक होटल में नौकरी करते हैं। परिजनों के मुताबिक, प्रियंका को 12 अगस्त को आशा कार्यकर्ता के साथ लोहाघाट लाया गया था, जहां उसका अल्ट्रासाउंड कराया गया। परिवार का कहना है कि उस समय चिकित्सकीय रिपोर्ट में गर्भस्थ शिशु जीवित और सामान्य बताया गया था, हालांकि पानी की कमी की बात सामने आई थी।
पेट दर्द के बाद लोहाघाट से शुरू हुई अस्पताल की दौड़
परिजनों के अनुसार, 17 अगस्त की रात प्रियंका को पेट में दर्द हुआ। इसके बाद अगले दिन 18 अगस्त को उसे गांव से उप जिला चिकित्सालय लोहाघाट लाया गया। परिवार का आरोप है कि वहां अल्ट्रासाउंड की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण उसे चम्पावत भेजा गया। इसके बाद परिजन प्रियंका को अल्ट्रासाउंड कराने के लिए चम्पावत के एक निजी अस्पताल लेकर पहुंचे। वहां हुई जांच में गर्भस्थ शिशु की कार्डियक एक्टिविटी नहीं मिली और शिशु की मृत्यु की जानकारी सामने आई। जीवन सिंह सामंत के अनुसार, इसके बाद वह अपनी पत्नी को जिला अस्पताल चम्पावत लेकर गए। उनका कहना है कि वहां स्त्री रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होने की बात कहकर उन्हें दोबारा लोहाघाट भेज दिया गया। लोहाघाट और चम्पावत के बीच बार-बार अस्पताल जाने से परेशान परिवार ने अंततः प्रियंका को खटीमा ले जाने का निर्णय लिया।
खटीमा में इलाज से बची मां की जान
जीवन सिंह के मुताबिक, खटीमा के एक निजी अस्पताल में प्रियंका का उपचार किया गया। उनका कहना है कि तब तक गर्भस्थ शिशु की गर्भ में ही मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन खटीमा में मिले उपचार से उनकी पत्नी की जान बच गई। परिवार ने पूरे घटनाक्रम को लेकर स्वास्थ्य सेवाओं और उपचार व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। वहीं, मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने इसे गंभीरता से लिया है।
डीएम ने दिए उच्च स्तरीय जांच के निर्देश
जिलाधिकारी मनीष कुमार ने गर्भस्थ शिशु की मृत्यु के प्रकरण का तत्काल संज्ञान लेते हुए निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जांच के लिए जांच समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने मुख्य चिकित्सा अधिकारी को उपलब्ध चिकित्सकीय अभिलेखों और पूरे प्रकरण से जुड़े सभी तथ्यों का बारीकी से परीक्षण कर जांच पूरी करने के निर्देश दिए हैं।
जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया है कि जांच पूरी होने से पहले किसी भी स्तर पर जल्दबाजी में निष्कर्ष नहीं निकाला जाएगा। सभी चिकित्सकीय दस्तावेजों और परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच के बाद ही तथ्य सामने आएंगे।
स्वास्थ्य विभाग ने रिपोर्ट के आधार पर रखी स्थिति
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. देवेश चौहान ने बताया कि 22 वर्षीय प्रियंका ने 18 अगस्त 2026 को उप जिला चिकित्सालय लोहाघाट की ओपीडी में चिकित्सकीय परामर्श लिया था। चिकित्सकीय अभिलेखों के अनुसार, मरीज ने बताया था कि लगभग दो दिनों से उसे गर्भस्थ शिशु की हलचल महसूस नहीं हो रही थी। उपलब्ध चिकित्सकीय जांच और अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक चिकित्सकीय सलाह एवं प्रबंधन किया गया।
सीएमओ के अनुसार, 12 अगस्त 2026 की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में गर्भस्थ शिशु जीवित पाया गया था। रिपोर्ट में शिशु की हृदय गति 135 प्रति मिनट दर्ज की गई थी। साथ ही फीटल मूवमेंट्स और कार्डियक मूवमेंट्स मौजूद होने का उल्लेख था। उस समय गर्भावस्था की अवधि लगभग 34 सप्ताह बताई गई थी। वहीं, 18 अगस्त 2026 की बाहरी/निजी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में गर्भस्थ शिशु की कार्डियक एक्टिविटी अनुपस्थित पाई गई। रिपोर्ट में fetal demise का उल्लेख किया गया है और फीटल मूवमेंट्स भी अनुपस्थित दर्ज किए गए हैं।
12 अगस्त को जीवित था शिशु, 18 अगस्त को मिली fetal demise की रिपोर्ट
मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि उपलब्ध दोनों अल्ट्रासाउंड रिपोर्टों से यह स्पष्ट होता है कि 12 अगस्त को गर्भस्थ शिशु जीवित था, जबकि 18 अगस्त को fetal demise पाया गया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे यह कहा जा सके कि गर्भस्थ शिशु की मृत्यु दो सप्ताह पूर्व ही हो गई थी। हालांकि, गर्भस्थ शिशु की मृत्यु किस समय और किस कारण हुई, यह केवल इन दो अल्ट्रासाउंड रिपोर्टों के आधार पर निर्धारित नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित चिकित्सकीय अभिलेखों, मां की स्वास्थ्य स्थिति और आवश्यक अन्य जांचों का विस्तृत परीक्षण जरूरी है।
जांच के बाद ही सामने आएगी वास्तविक स्थिति
प्रकरण को लेकर जहां परिवार ने अस्पतालों की व्यवस्थाओं और उपचार प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, वहीं स्वास्थ्य विभाग ने उपलब्ध चिकित्सकीय दस्तावेजों के आधार पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। अब जांच समिति पूरे मामले में अस्पतालों में हुए उपचार, चिकित्सकीय परामर्श, अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट, मरीज की स्वास्थ्य स्थिति और अन्य संबंधित तथ्यों का परीक्षण करेगी।
जिलाधिकारी मनीष कुमार ने जांच समिति को संवेदनशीलता और पूरी गंभीरता के साथ जांच कर तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने लोगों से अपील की है कि जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति अथवा चिकित्सकीय संस्थान के संबंध में कोई निष्कर्ष न निकाला जाए। उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट के आधार पर ही प्रकरण में आवश्यक निर्णय और कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

