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चम्पावत : बकोड़ा में सड़क का इंतजार खत्म नहीं, घायल किसान को कंधों पर पहुंचाया मोटर मार्ग तक

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चम्पावत। जिले को मॉडल जिला बनाने के दावों के बीच दूरस्थ ग्राम पंचायत बकोड़ा से सामने आई तस्वीरें जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर रही हैं। गांव तक सड़क सुविधा नहीं होने के कारण ग्रामीण आज भी मरीजों और घायलों को कठिन पैदल रास्तों से कंधों के सहारे मोटर मार्ग तक पहुंचाने को मजबूर हैं।

हाल ही में गांव के एक किसान के घायल होने के बाद ग्रामीणों ने उसे डंडे और अस्थायी सहारे की मदद से पैदल रास्ते से मोटर मार्ग तक पहुंचाया। इसके बाद घायल किसान को उपचार के लिए टनकपुर अस्पताल ले जाया गया। इस घटना ने गांव में सड़क सुविधा की जरूरत को एक बार फिर उजागर कर दिया है।

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जानकारी के अनुसार मोस्टा ग्राम पंचायत का बकोड़ा गांव। गहत की दाल की खेती के लिए हल जोतने के दौरान 80 साल के दीवान सिंह के पांव में 6 दिन पहले काटा या शीशा कुछ चुभ गया था। लेकिन मौसम की खराबी और दूसरे कारणों से दीवान सिंह इलाज के लिए आज 22 अगस्त को टनकपुर अस्पताल पहुंचाए गए। मोस्टा से सीम गांव तक करीब 8 किलोमीटर दूरी को तय करने के लिए 1 डंडे का आसरा। डंडे में बांधे गए दीवान सिंह को 4 (रवींद्र रावत, जगदीश सिंह, प्रियांशु और केदार) लोग करीब 2 घंटे में सीम गांव तक लाए। फिर सीम से जीप के जरिए करीब 35 किलोमीटर दूर टनकपुर के अस्पताल ले जाया गया।

ग्रामीणों का कहना है कि सड़क के अभाव में किसी व्यक्ति के बीमार या घायल होने पर सबसे बड़ी चुनौती उसे अस्पताल तक पहुंचाने की होती है। गंभीर मरीज, गर्भवती महिला, बुजुर्ग या घायल व्यक्ति के लिए समय बेहद महत्वपूर्ण होता है, लेकिन बकोड़ा में अस्पताल पहुंचने से पहले ही ग्रामीणों को लंबा और दुर्गम रास्ता पैदल तय करना पड़ता है।

ग्राम प्रधान रविंद्र सिंह रावत के अनुसार, गांव में सड़क नहीं होने के कारण ग्रामीणों को लंबे समय से परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सड़क सुविधा के अभाव में गांव से पलायन की समस्या भी बढ़ रही है। ग्रामीण लंबे समय से गांव को सड़क से जोड़ने की मांग कर रहे हैं।

चम्पावत पीएमजीएसआई के अधिशासी अभियंता वीरेंद्र सिंह बोहरा ने बताया है कि 22.30 किलोमीटर लंबी मंच-मोस्टा-बकोड़ा सड़क से संबंधित सभी औपचारिकताएं पूरी की जा चुकी हैं। DPR बनाई जा चुकी है। ₹ 18.30 करोड़ की DPR भारत सरकार भेजी गई है वन प्रस्ताव अपलोड कर दिया गया है। स्वीकृति के बाद सड़क का काम शुरू करा दिया जाएगा।

सवाल यह है कि डीपीआर केंद्र सरकार तक पहुंच चुकी है तो बकोड़ा तक सड़क कब पहुंचेगी?

मॉडल जिले की वास्तविक तस्वीर केवल जिला मुख्यालय और प्रमुख शहरों की सुविधाओं से नहीं, बल्कि दूरस्थ गांवों में उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं से तय होगी। बकोड़ा के ग्रामीणों के लिए सड़क अब सुविधा का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सुरक्षा और गांव में रुककर जीवन जीने का सवाल बन चुकी है।