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पूजा कर रही बुजुर्ग महिला पर दरांती-पत्थरों से हमला, मौत; 95 वर्षीय मां भी घायल

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स्याल्दे के बसई गांव में मामूली कहासुनी के बाद खूनी वारदात, आरोपी फरार; पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर तलाश तेज की

स्याल्दे/अल्मोड़ा। विकासखंड स्याल्दे के बसई (रखेत) गांव में शनिवार को मामूली कहासुनी ने खूनी रूप ले लिया। आरोप है कि 70 वर्षीय राजे सिंह ने पड़ोस में रहने वाली 66 वर्षीय तुलसी देवी पर दरांती और पत्थरों से हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल तुलसी देवी की मौत हो गई, जबकि बेटी को बचाने पहुंची उनकी 95 वर्षीय मां धनुली देवी भी हमले में घायल हो गईं। घटना के बाद से गांव में सनसनी फैल गई। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसकी तलाश शुरू कर दी है।

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बताया गया कि तुलसी देवी करीब 40 वर्षों से अपने मायके में रह रही थीं और अपनी 95 वर्षीय मां धनुली देवी की देखभाल करती थीं। शनिवार सुबह वह घर में पूजा-पाठ कर रही थीं। इसी दौरान राजे सिंह खेत में काम करने के लिए घर के पास पहुंचा। किसी बात को लेकर दोनों के बीच कहासुनी हो गई। आरोप है कि विवाद बढ़ने पर राजे सिंह ने तुलसी देवी पर दरांती और पत्थरों से हमला कर दिया। बेटी को बचाने पहुंची धनुली देवी भी घायल हो गईं। वारदात के बाद आरोपी मौके से फरार हो गया। सूचना पर पहुंची पुलिस ने घटनास्थल से जानकारी जुटाने के बाद आरोपी की तलाश में दबिश शुरू कर दी है। पुलिस के अनुसार घटना के वास्तविक कारणों की जांच की जा रही है।

मामूली विवाद में कत्ल कर दी गई 66 वर्षीय तुलसी देवी की जिंदगी दुखों और संघर्षों की एक लंबी दास्तान थी। ससुराल से मिला सन्नाटा और चार दशकों तक मायके में बूढ़ी मां का सहारा बनकर काटी गई जिंदगी का अंत इतना खौफनाक होगा यह किसी ने नहीं सोचा था। 95 साल की लाचार मां के सामने जब उनकी बेगुनाह बेटी तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही थी, तो गांव में पुरुषों का न होना इस गरीब परिवार के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन गया।

ग्राम सभा बसई के रतखेत तोक में शनिवार को हुई तुलसी देवी की हत्या सिर्फ एक अपराध नहीं बल्कि एक बेहद सीधे और संघर्षशील जीवन का दुखद अंत है। मूल रूप से नैहलगैर ग्राम सभा घुगती (देघाट) की रहने वाली तुलसी देवी की शादी मोहन चंद्र से हुई थी लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कोई संतान न होने के कारण पति ने दूसरा विवाह कर लिया। इस धोखे और दर्द से आहत होकर तुलसी ने हमेशा के लिए ससुराल छोड़ दिया और लगभग 40 साल पहले अपने मायके रतखेत लौट आईं।

मायके में भाइयों के अपने परिवार अलग होने के बाद, तुलसी अपनी 95 वर्षीय बुजुर्ग मां धनुली देवी के साथ अकेले रहने लगीं। बेहद गरीबी और अभावों के बीच तुलसी ने कभी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने उम्र भर मेहनत-मजदूरी की और अपनी बूढ़ी मां की सेवा में खुद को समर्पित कर दिया। गांव के समाजसेवी कृपाल दत्त ढौंडियाल के अनुसार तुलसी बेहद सरल, सामाजिक और धार्मिक स्वभाव की महिला थीं, जो अपना अधिकांश समय पूजा-पाठ और मंदिरों में बिताती थीं। 95 वर्ष की इस ढलती उम्र में जहां एक मां को अपनी अंतिम यात्रा के लिए बच्चों के सहारे की उम्मीद होती है, वहां धनुली देवी को अपनी ही गोद में पली-बढ़ी बेटी की अर्थी को देखना पड़ रहा है। यह दुख उनके जीवन पर पहाड़ के सबसे ऊंचे शिखर से भी भारी बनकर टूटा है जिसका दर्द शायद वे जीते जी कभी नहीं भूल पाएंगी।