टनकपुर में धूमधाम से मनाया गया गौरा पर्व, शिव-पार्वती की निकली डोला यात्रा
टनकपुर/चम्पावत। नारी शक्ति सेवा समिति की महिलाओं ने कर्मचारी कॉलोनी, वार्ड नंबर-6 टनकपुर में गौरा पर्व धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया। स्वर्गीय पार्वती बिष्ट के निवास से समिति की अध्यक्ष श्रीमती दीपा धानिक के नेतृत्व में शिव-पार्वती की डोला यात्रा निकाली गई। महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ डोला यात्रा में हिस्सा लिया और भक्ति गीतों के बीच जमकर नृत्य किया।
डोला यात्रा कर्मचारी कॉलोनी से शुरू होकर तहसील रोड स्थित शनि मंदिर पहुंची, जहां शिव-पार्वती के डोले का विधिवत विसर्जन किया गया। इस दौरान महिलाओं ने पार्वती माता के जयकारे लगाए और पारंपरिक गीतों पर नृत्य कर पर्व की खुशियां मनाईं। कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।

डोला यात्रा में कमला जोशी, आशा साह, गीता जोशी, देवकी डपोटी, नीमा भंडारी, सरस्वती जोशी, रेखा रौतेला, देवकी रौतेला, अंकिता जोशी, सीमा नेगी, राधा बिष्ट, सीमा जोशी, कविता चौधरी, लता पांडेय, प्रिया नेगी, ऊषा जोशी, देवकी पाटनी, रजनी जोशी, जानकी मैहर, सपना पाटनी, चंद्रकला जोशी, अनिता भट्ट, अनीता चौहान, तनुजा बिष्ट, उमा जोशी, शशि वर्मा, तनुजा जोशी, गोदावरी नेगी, गीता बोरा, महेन्द्री देवी, लीला जोशी, रेखा बिष्ट, आशा मेहर सहित बड़ी संख्या में महिलाएं मौजूद रहीं।

कुमाऊं की लोक परंपरा से जुड़ा है गौरा पर्व
कुमाऊं में सातू-आठू यानी गौरा पर्व का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है और विशेष रूप से महिलाएं श्रद्धा एवं उत्साह के साथ इसे मनाती हैं।
पर्व की शुरुआत भाद्र माह की पंचमी को बिरुड़ भिगाने की परंपरा से होती है। बिरुड़ पांच या सात प्रकार के अनाजों को भिगोकर तैयार किए जाते हैं। इनमें मक्का, गेहूं, गहत, गुरुस, चना, मटर और कलों जैसे अनाज शामिल होते हैं। इन्हें तांबे या पीतल के स्वच्छ पात्र में नौले या धारे के शुद्ध जल के साथ भिगोया जाता है।
परंपरा के अनुसार पात्र के चारों ओर गोबर से नौ या ग्यारह छोटी आकृतियां बनाई जाती हैं और उनमें दूब डोई जाती है। इसके बाद महिलाएं शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं तथा उनके जीवन से जुड़े लोकगीत गाते हुए नृत्य और पारंपरिक खेलों में शामिल होती हैं।
सातू-आठू पर्व भाद्र माह की पंचमी से शुरू होकर लगभग एक सप्ताह तक चलता है। लोक मान्यता के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव से नाराज होकर मायके आती हैं और उन्हें वापस लेने भगवान शिव धरती पर आते हैं। इसी प्रसंग को गौरा देवी की विदाई और शिव-पार्वती के मिलन के रूप में मनाया जाता है। कुमाऊं में यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति और लोक संस्कृति से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपरा के रूप में भी मनाया जाता है।

